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higher education regulator – भारतीय उच्च शिक्षा में ऐतिहासिक बदलाव: UGC, AICTE और NCTE का स्थान लेगा एक नया एकल नियामक

भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली में एक ऐतिहासिक और संरचनात्मक बदलाव की तैयारी है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ‘विकसित भारत शिक्षा अधीक्षण बिल’ को मंजूरी दे दी है, जिसके तहत वर्तमान में चल रहे कई नियामकों की जगह एक एकीकृत नियामक संस्था बनेगी। इसका सीधा असर यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC), ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (AICTE) और नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन (NCTE) जैसी प्रमुख संस्थाओं पर पड़ेगा।

बदलाव का सार: एक नजर में

इस महत्वपूर्ण सुधार को समझने के लिए मुख्य बातों का सार नीचे तालिका में दिया गया है:

नए एकल नियामक की भूमिकाएं और लाभ

नई प्रणाली का उद्देश्य मौजूदा बहुलता और जटिलता को दूर करना है। नया एकल नियामक मुख्य रूप से तीन प्रमुख कार्यों पर केंद्रित होगा:

  1. विनियमन (रेगुलेशन)

  2. मान्यता (अक्रिडेशन)

  3. शैक्षणिक एवं पेशेवर मानक निर्धारण

इस बदलाव के पीछे सरकार का मुख्य लक्ष्य हितों के टकराव को रोकना, सूक्ष्म प्रबंधन को कम करना और एक स्पष्ट, जवाबदेह ढांचा तैयार करना है। अपेक्षा की जा रही है कि इससे शिक्षण संस्थानों के लिए स्वीकृतियाँ लेना और अनुपालन करना आसान हो जाएगा, जिससे गुणवत्ता और शिक्षण परिणामों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जा सकेगा।

पृष्ठभूमि और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का संदर्भ

यह कदम नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में की गई सिफारिशों को आगे बढ़ाता है। NEP दस्तावेज़ में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि उच्च शिक्षा क्षेत्र को मजबूत करने और उसे भविष्य के अनुकूल बनाने के लिए नियामक प्रणाली में व्यापक बदलाव की आवश्यकता है। नीति का विचार यह है कि विनियमन, मान्यता, निधिकरण और मानक निर्धारण जैसे कार्य अलग-अलग और स्वतंत्र इकाइयों के जरिए किए जाने चाहिए।

‘हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया (HECI)’ का विचार नया नहीं है; इस पर 2018 से ही चर्चा और मसौदा तैयारी चल रही थी। वर्तमान शिक्षा मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस प्रस्ताव को पुनर्जीवित करने और NEP 2020 के दृष्टिकोण के साथ इसे आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है।

निष्कर्ष

भारतीय उच्च शिक्षा के नियामक परिदृश्य में यह प्रस्तावित बदलाव एक बड़े सुधार का प्रतीक है। यदि यह बिल संसद से पारित हो जाता है, तो इससे दशकों पुरानी व्यवस्था बदल जाएगी और संस्थानों तथा छात्रों के लिए एक अधिक एकीकृत, कुशल तथा गुणवत्ता-केंद्रित वातावरण बनने की उम्मीद है। हालाँकि, चिकित्सा एवं विधि शिक्षा तथा निधिकरण प्रक्रिया को अलग रखने का निर्णय यह दर्शाता है कि यह संक्रमण चरणबद्ध और सावधानीपूर्वक किया जा रहा है। यह बदलाव भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली को 21वीं सदी की चुनौतियों और अपेक्षाओं के अनुरूप ढालने की दिशा में एक साहसिक कदम माना जा रहा है।

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